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उनकी औकात ही क्या मुझसे टकराने की वो क्या शेर को दावत देंगें क्या उनकी औकात भी है शेर को खिलाने की
उनका आंचल मेरे चहरे पे जब लहराया मेरे चहरे पे ताजगी लाया
हर कोई राज छुपा रहा है अपना होकर हमसे राज ले रहे हैं अपना कहकर
पता नहीं लोग बात बात में केसे रो देते हैं हम तो तकलीफ में भी नहीं रो पाते हैं
मैंने जो भी गुनाह किया खुद किया अपने गुनाहों में किसी को सामिल न किया 
मैंने तो एक अपने से मोहब्बत की थी फिर भी वफा न मिल सकी गैर से मोहब्बत करके क्या ख़ाक वफा मिलेगी
जब भी तेरी गली (दहलीज़) से गुजरा देखना चाहा तेरा चेहरा